बसंत गीत

हौले हौले आई रानी ॠतु की

बनके बगिया में बसंती बहार
कैसे संभालू मोरा जियरा ।

झर झर झर पत्ते झरते
पर्ण स्वर्ण से सुन्दर लगते,
कों पल झाँकत आय

धरती पीली चूनर औढ़े
नभ से जैसे के झर बरसे,
वसुधा वधु सी लजाए

रंग बिरंगे फूल खिले हैं
भंवरों के गुंजन भाये

मदन बाण से वसुधा घायल,
मंद समीर की रूनझुन पायल
नदियां छलकत जाए ॥