कोसा की कमाई रेशम का रेशमी रोजगार

Kosa and silk business career earns bike

कोसा फल की कमाई ने बदली दयाराम की तकदीर

रायपुर, 08 अप्रैल 2016 - दस साल पहले मजदूरी के लिए पैदल जाने वाला दयाराम आज अपनी मोटर साइकिल से कोसा फल बेचने जाता है। अब वह अपने घर में एक छोटी सी किराना की दुकान चलाता है और वह 20 बकरियों का मालिक भी है। साल में 60-70 हजार रूपए वह बकरी बेच कर कमाता है। खुद भले न पढ़ पाया लेकिन कोसा फल की बदौलत वह अपने दोनों बेटियों और बेटे को अच्छी शिक्षा दे रहा है।बस्तर जिले के ग्राम बड़े गरावण्ड के टसर कृमी पालन केन्द्र में कोसा पालकर दयाराम ने अपने परिवार को एक रेशमी संसार दे डाला है। ग्राम बड़े गरावण्ड में रेशम विभाग का एक 10 एकड़ का प्लाट है। यहां अर्जून का रोपण किया गया है। इस रोपण में मां वामन देई कोसा कृमि पालन स्वसहायता समूह कोसा पालता है। दयाराम समूह के अध्यक्ष है। दयाराम आज से 10-12 वर्ष पहले मजदूरी किया करते थे। उनके पास डेढ़ एकड़ खेत है, लेकिन छह सदस्यों का भरण पोषण नहीं होता था, उसी दौरान ये रेशम विभाग के सम्पर्क में आए और गांव में अर्जुन रोपण में कोसा पालन से जुड़ गए। यहां से इन्हें साल में 30 से 35 हजार रूपए की अतिरिक्त आमदनी होने लगी। कोसा के इसी पैसे को बचाकर दयाराम ने तीसरे साल में ही 45 हजार रूपए की पूंजी से 20 बकरी खरीदकर पाली। बकरी का धंधा चल निकला। उन्हें अब 60 से 70 हजार रूपए की आमदनी होने लगी। फिर दयाराम ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसी पैसे से वे अब खेती मंे भी पूंजी लगाने लगे। अब दयाराम के पास कोसा फल के साथ ही किराना दुकान और बकरी पालन से भी आमदनी होने लगी है। पैसा का अभाव अब नहीं रहा। दयाराम ने अपने बच्चों को खेत के बजाए स्कूल भेजने लगे हैं। आज एक बच्चा स्नातक कर रहा है, तो दूसरा कम्प्यूटर की ट्रेनिंग ले रहा है। दोनों बेटियां भी 10वी और 11वीं में पढ़ रही है। कोसा फल की बदौलत दयाराम ने घर में जरूरत के भौतिक संसाधन भी जुटा लिए हैं।  

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