पीर नीर की गागरी उपहार देने लाई हूँ

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पीर नीर की गागरी उपहार देने लाई हूँ
सुख के दूर कगार दो मैं गहरी बीच की खाई हूँ ।

लो आज फिर क्यों आ गई सुधि
उन दिवस और रात की,
घर था जब उपवन में अपना
साथ देने बहार थी
झर गए वे पराग से और धूल में मैं समाई हूँ

कितने तिनके नीड़ गढ़ते
कितने उड़के टूट जाते
मेरे पंखों पर समय ने
कितनी की है गहरी चोटें
नीड़ भीड़ में खो गई अब पंख चुनने आई हॅँ ।

मन के पग कहें चल पड़ो अब
उँचे से किसी शैल पर
झर पड़े जहाँ बूँद बनकर
मेरे भाग्य के भाल पर
धुल धवल जीवन बने इस आस की भरमाई हूँ ।

क्षण क्षण मरण का मंत्र जपके
कै से अमृत दान दूँ
सूर्य जैसा आप जलके
रश्मि का संसार हूं
क्या मिलेगा अब मुझे मैं रजनि की परछाई हूँ ।

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