
ऐसे कैसे जी रहे हैं आजकल
लगे मखमल सी जिंदगी में टाटके पैबंद ॥
गाँव गाँव गली गली
ऐसी क्या हवा चली
दूर तक न दिख रही
एक भी कली खिली
धनी पीपल की छाँव को
ढूँढते नयन ।
सोने से मकान की
इंट इंट हिल रही,
लहलहाती भूमि पर
अग्नि रेख खिंच रही
खून सने हाथ ही तो
कर रहे हवन ॥ read more »

तब मन गंगाजल होता है
जब प्रेम हृदय को छूता है
विश्वास विलम सम भावों का,
होता एक बसेरा है ।
कितने सिंहासन छोड़ चुके हैं,
कितने सिंहासन डोल चुके हैं,
कितने जहर के प्याले पी गए,
कितने हंसके फासी बढ़ गए ॥
जो प्रेम के खातिर दुनियाँ तजता,
जीवन हवन रचाती है,
वो मीरा तुलसी होता है । read more »

एक सफर है जिंदगी खुद की तलाश का,
अनबुझी और अनकही सी प्यास का ।
कामना थी नदियां की मौज बनके जीलूँ,
जहाँ मिल सके मधुरस अंजुरी से पीलूँ,
एक चमन है जिंदगी खिलते गुलाब का ॥
चाहती हूं चाँद और सूरज से बात करलूँ,
पर्वत शिखर को अपने हाथों सेजा के छू लूँ
एक सपन है जिंदगी पाने की चाह का ॥ read more »

प्रिय गॉउ कैसे मधुर गीत
जब हृदय मधु से रीता है,
जीवन हुआ तपती सिकता,
मनमीन सा इसमें जीता है ।
मरे दिवस रैन को पुस्तक में,
सूचे फूलों सा मधुमास रहे,
जो लौटे कभी ना मुरली में,
उसतान की मुझको आस रहे,
जिउँ कैसे फिरसे वो पल मैं,
मधुबन में कभी जो बीता है ...... read more »

मन तो है रंगहीन पानी
जो भी चाहे रंग डाल लो,
थोड़े टेसू थोड़ी केसर,
थोड़ा अबरक घोल लो ।
देखना फिर रंग मनकर
दुनियाँ पर चढ़ जायेगा
एक छुअन से इंद्रधनुषी,
कोई भी बन जायेगा ॥ read more »

पीर नीर की गागरी उपहार देने लाई हूँ
सुख के दूर कगार दो मैं गहरी बीच की खाई हूँ ।
लो आज फिर क्यों आ गई सुधि
उन दिवस और रात की,
घर था जब उपवन में अपना
साथ देने बहार थी
झर गए वे पराग से और धूल में मैं समाई हूँ
कितने तिनके नीड़ गढ़ते
कितने उड़के टूट जाते
मेरे पंखों पर समय ने
कितनी की है गहरी चोटें
नीड़ भीड़ में खो गई अब पंख चुनने आई हॅँ । read more »

रंग गुलाल न होली होती,
ओंठ हंसी न खिलती ,
सतरंगी हो मनुआ नाचे
तबही होली होती ॥
आम की डाल गई बौरा,
फूल वे डोल रहा भौंरा ॥
रंग बसंती धरती ओढे
कली को छेड रहा भौरा ॥
गली गली जब पुरवा महके
तबही होली होती ॥ read more »

राधा सुकुमारी पे, नटवर गिरधारी पे,
रंग की पिचकारी पे, सखियन की गारी पे ।
ब्रज रहा झूम, धूम मची॥3॥
रंग और गुलाल उडे,
बादल भी लाल भए,
राधा पे रंग डारे,
सखियन की टोली संग, नटखट संग भोरी संग,
श्याम रहे घूम, धूम मची ॥3॥ read more »

ये गगन और ये धरा
कह रही है ये कथा,
अनंत रूपरंग की
आवाज जल तरंग,
इनमें डूबलूँ जरा ।
रश्मियों में झूमते
बिजलियों में कौंधते,
तारिका में झांकते
शब्द थरथरा रहे ।
सुनलूँ इनने क्या कहा । read more »

रूक जा हवा दम भरको,
थम जा घटा पल भर को,
तो गीत मैं बना लँ,
इस धुन को गुनगुना लँ,
संगीत मेरे मन का,
दुनिया को मैं सुनालूँ ।
नेह बहे झरनों में
प्रीत बसे फूलों में
लहरों को अंत मिले,
नदिया के कूलों में
रस इनका मैं चुरा हूँ
प्रेम बढ़े जिससे वो शब्द में सुनालूँ । read more »
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