कविता

महिला दिवस और होली कवि मिलन

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वेब मीडिया और हिन्‍दी साहित्‍य परिषद द्वारा टिकरापारा रायपुर में होली एवं महिला दिवस पर कवि सम्‍मेलन समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें महंगाई और मिलावट के साथ कृष्‍ण को होली के लिए मंजुला श्रीवास्‍तव ने आमंत्रण किया, छत्‍तीसगढ़ सरकार को 2 रूपया किलो चावल और दारू की दुकान के लिए आशा श्रीवास्‍तव ने होली और महिला दिवस की बधाई दी। वहीं गीतकार श्‍यामसुंदर त्रिपाठी ने भजन सरिता के द्वारा देश की वर्तमान रामायण का मतला दिया। अरूणा चौहान और जयप्रकाश त्रिपाठी श्रृंगार के साथ गुलालमय होली और महंगाई के साथ होली चित्रण किया।

श्री सना अहमद ने वन्‍दे मातरम गीत को उर्दु में गाकर उन मुस्लिम मजहबी लोगों को गीत की संस्‍कृति से परिचीत करवाया जो कि महिला दिवस का सांकेतिक गीत है की महिलाएं अमन और चैन के लिए भाषाओं के चक्रव्‍यूह को तोड़कर भी भारत की सांस्‍कृतिक एकता में अपना अमूल्‍य सहयोग दे सकती हैं। यह भी एक होली का सुंदर रंग है।

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ऐसे कैसे जी रहे हैं हम

ऐसे कैसे जी रहे हैं आजकल
लगे मखमल सी जिंदगी में टाटके पैबंद ॥

गाँव गाँव गली गली
ऐसी क्या हवा चली
दूर तक न दिख रही
एक भी कली खिली
धनी पीपल की छाँव को
ढूँढते नयन ।

सोने से मकान की
इंट इंट हिल रही,
लहलहाती भूमि पर
अग्नि रेख खिंच रही
खून सने हाथ ही तो
कर रहे हवन ॥  read more »

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तब मन गंगाजल होता है

तब मन गंगाजल होता है
जब प्रेम हृदय को छूता है
विश्वास विलम सम भावों का,
होता एक बसेरा है ।

कितने सिंहासन छोड़ चुके हैं,
कितने सिंहासन डोल चुके हैं,
कितने जहर के प्याले पी गए,
कितने हंसके फासी बढ़ गए ॥

जो प्रेम के खातिर दुनियाँ तजता,
जीवन हवन रचाती है,
वो मीरा तुलसी होता है ।  read more »

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एक सफर है जिंदगी खुद की तलाश का

एक सफर है जिंदगी खुद की तलाश का,
अनबुझी और अनकही सी प्यास का ।

कामना थी नदियां की मौज बनके जीलूँ,
जहाँ मिल सके मधुरस अंजुरी से पीलूँ,
एक चमन है जिंदगी खिलते गुलाब का ॥

चाहती हूं चाँद और सूरज से बात करलूँ,
पर्वत शिखर को अपने हाथों सेजा के छू लूँ
एक सपन है जिंदगी पाने की चाह का ॥  read more »

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प्रिय गाउँ कैसे मधुर गीत

प्रिय गॉउ कैसे मधुर गीत
जब हृदय मधु से रीता है,
जीवन हुआ तपती सिकता,
मनमीन सा इसमें जीता है ।

मरे दिवस रैन को पुस्तक में,
सूचे फूलों सा मधुमास रहे,
जो लौटे कभी ना मुरली में,
उसतान की मुझको आस रहे,
जिउँ कैसे फिरसे वो पल मैं,
मधुबन में कभी जो बीता है ......  read more »

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मन तो है रंगहीन पानी

मन तो है रंगहीन पानी
जो भी चाहे रंग डाल लो,
थोड़े टेसू थोड़ी केसर,
थोड़ा अबरक घोल लो ।

देखना फिर रंग मनकर
दुनियाँ पर चढ़ जायेगा
एक छुअन से इंद्रधनुषी,
कोई भी बन जायेगा ॥  read more »

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पीर नीर की गागरी उपहार देने लाई हूँ

पीर नीर की गागरी उपहार देने लाई हूँ
सुख के दूर कगार दो मैं गहरी बीच की खाई हूँ ।

लो आज फिर क्यों आ गई सुधि
उन दिवस और रात की,
घर था जब उपवन में अपना
साथ देने बहार थी
झर गए वे पराग से और धूल में मैं समाई हूँ

कितने तिनके नीड़ गढ़ते
कितने उड़के टूट जाते
मेरे पंखों पर समय ने
कितनी की है गहरी चोटें
नीड़ भीड़ में खो गई अब पंख चुनने आई हॅँ ।  read more »

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रंग गुलाल न होली होती

रंग गुलाल न होली होती,
ओंठ हंसी न खिलती ,
सतरंगी हो मनुआ नाचे
तबही होली होती ॥

आम की डाल गई बौरा,
फूल वे डोल रहा भौंरा ॥
रंग बसंती धरती ओढे
कली को छेड रहा भौरा ॥
गली गली जब पुरवा महके
तबही होली होती ॥  read more »

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होली गीत

राधा सुकुमारी पे, नटवर गिरधारी पे,
रंग की पिचकारी पे, सखियन की गारी पे ।
ब्रज रहा झूम, धूम मची॥3॥

रंग और गुलाल उडे,
बादल भी लाल भए,
राधा पे रंग डारे,
सखियन की टोली संग, नटखट संग भोरी संग,
श्याम रहे घूम, धूम मची ॥3॥  read more »

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ये गगन और ये धरा

ये गगन और ये धरा
कह रही है ये कथा,
अनंत रूपरंग की
आवाज जल तरंग,
इनमें डूबलूँ जरा ।

रश्मियों में झूमते
बिजलियों में कौंधते,
तारिका में झांकते
शब्द थरथरा रहे ।
सुनलूँ इनने क्या कहा ।  read more »

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