ऐसे कैसे जी रहे हैं हम

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ऐसे कैसे जी रहे हैं आजकल
लगे मखमल सी जिंदगी में टाटके पैबंद ॥

गाँव गाँव गली गली
ऐसी क्या हवा चली
दूर तक न दिख रही
एक भी कली खिली
धनी पीपल की छाँव को
ढूँढते नयन ।

सोने से मकान की
इंट इंट हिल रही,
लहलहाती भूमि पर
अग्नि रेख खिंच रही
खून सने हाथ ही तो
कर रहे हवन ॥

लड़कियाँ हैं लकड़ियाँ,
जंगलों से बीन लीं,
सतीनाम चूनरी,
ओढ़ चिता चढ़ गई,
खिंचे द्रौपदी के चीर,
कभी सीताहरण ॥

कोई चीज है, नहीं
जो हाट में न मिल रही
शर्म से शराब तक
हाट बीच बिक रही,
बंधे कुर्सी के पाँव से
ईमान और धरम ॥

आदमी सही वही
इमली को आम कहे
आइने के गाँव से,
दूर बहुत दूर रहे,
बंद तालों में कर लिए
अंत:करण ॥

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